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राइट टु प्रिवेसी अब मौलिक अधिकार

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नई दिल्ली: निजता का अधिकार मौलिक अधिकार करार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सेक्शुअल ओरिएंटेशन निजता का महत्वपूर्ण अंग है। साथ ही कहा कि डेटा प्रोटेक्शन के लिए सरकार को मजबूत तंत्र विकसित करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सहित 4 जज ने एक साथ जजमेंट लिखा जबकि बाकी 5 जजों ने अलग-अलग फैसले लिखे हैं लेकिन सभी ने एक मत से निजता के अधिकार को जीवन के अधिकार का मूलभूत हिस्सा करार दिया है।

सेक्शुअल ओरिएंटेशन को निजता का अहम अंग करार देने के बाद अब LGBT समुदाय की उम्मीद बढ़ी है कि समलैंगिकता को अपराध मानने वाले आईपीसी के सेक्शन 377 को खत्म करने का रास्ता साफ हो सकेगा। फिलहाल समलैंगिकता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की लार्जर बेंच में मामला चल रहा है।

जीवन का अधिकार नैसर्गिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर, जस्टिस आर. के. अग्रवाल, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस अब्दुल नजीर ने एक साथ लिखे फैसले में कहा कि जीवन और व्यक्तिगत आजादी (लाइफ ऐंड पर्सनल लिबर्टी) अलग न किए जाने वाला मौलिक अधिकार है। ये मानवीय अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं।

जीवन की गरिमा, लोगों के बीच समानता और आजादी संविधान का मौलिक स्तंभ है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन का अधिकार संविधान बनने के बाद नहीं बना है बल्कि ये अधिकार संविधान ने नैसर्गिक अधिकार के तौर पर माना है।

निजता का अधिकार संरक्षित अधिकार है जो व्यक्तिगत आजादी और जीवन के अधिकार के तहत अनुच्छेद-21 में ही समाहित है। निजता एक संदर्भ से दूसरे संदर्भ में अलग-अलग हो सकता है। संविधान के मूल में मानवीय गरिमा है और निजता उसी में है। निजता मानक और स्पष्टता लिए हुए अधिकार है।

जीवन का अधिकार, व्यक्तिगत आजादी का अधिकार और स्वतंत्रता का अधिकार इनमें ही निजता का अधिकार अनंत स्तर पर समाहित है।

सार्वजनिक जगह पर भी निजता खत्म नहीं होती

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने कहा कि निजता के मूल में व्यक्तिगत घनिष्ठता, पारिवारिक जीवन, शादी, प्रजनन, घर, सेक्सुअल ओरिंटेशन सबकुछ है। साथ ही प्रिवेसी व्यक्तिगत स्वायत्तता की सेफगार्ड है जो किसी के जिंदगी में महत्वपूर्ण रोल रखता है।

व्यक्ति की चाहत, जीवन शैली स्वभाविक तौर पर उसकी निजता है। निजता बहुलता और विविधता वाली संस्कृति को भी प्रोटेक्ट करता है। ये भी समझना होगा कि किसी की भी निजता सार्वजनिक जगह में भी खत्म नहीं होती।

अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार पर तर्कपूर्ण रोक संभव

संविधान को जरूरत के हिसाब से बदलाव करना होगा। चुनौती को देखते हुए समय की मांग को पूरा करना जरूरी होता है। इसे संवैधानिक दृष्टिकोण को लागू करने के समय में बांधा नहीं जा सकता। मौजूदा दौर में तकनीकी बदलाव हो रहा है।

7 दशक में भारी बदलाव हुआ है। काफी विकास भी हुआ है। संविधान की व्याख्या ज्यादा लचीले तरीके से होनी चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ी उसकी विशेषताओं से जुड़ सके। अन्य अधिकार जैसे जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की तरह ही निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है। इसके लिए तर्कपूर्ण रोक होगा।

अनुच्छेद-21 के तहत निजता के अधिकार के लिए भी कानून के तहत न्यायसंगत तरीके से सीमा तय होगा लेकिन ये सीमा निष्पक्ष, उचित और तर्कपूर्ण हो। निजता के नकारात्मक और सकारात्मक पहलू दोनों हैं। नकारात्मक पहलू में राज्य को व्यक्तिगत जीवन में दखल से रोकता है, वहीं सकारात्मक पहलू यह है कि राज्य की जिम्मेदारी होगी कि वह हर व्यक्ति के निजता को संरक्षित करे।

सूचनात्मक दौर में निजता को खतरा

सूचनात्मक निजता भी निजता के अधिकार का पार्ट है। सूचनात्मक दौर में निजता को खतरा उत्पन्न हो रहा है। न सिर्फ राज्य से बल्कि प्राइवेट संस्था से भी यह खतरा हो रहा है। हम केंद्र सरकार को कहते हैं कि वह एक मजबूत शासन प्रणाली विकसित करे ताकि लोगों का डेटा प्रोटेक्शन हो सके। इसके लिए जरूरी है कि एक सजग और संवेदनशील संतुलन कायम किया जाए।

व्यक्तिगत हित और राज्य के वैध जरूरत के बीच संतुलन कायम किया जाए, जो सरकार का वैध मकसद है, मसलन राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध पर नियंत्रण, नए-नए सृजन को बढ़ावा देना, ज्ञान का विकास और समाजिक बेनिफिट के लिए रुकावट को खत्म करने जैसे काम के लिए संतुलन बनाया जाए।

 

जस्टिस जे. चेलामेश्वर

कोई भी मौलिक अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है और निजता के अधिकार की भी सीमाएं हैं। यह केस दर केस निर्भर करेगा कि किस किस तरह की निजता की बात है। अनुच्छेद-21 निजता की गारंटी देता है। ऐसे में जो भी सीमाएं हैं, वह निष्पक्ष, उचित और तर्कपूर्ण होनी चाहिए।

जस्टिस सप्रे और जस्टिस रोहिंटन नरीमन

जस्टिस सप्रे ने कहा कि निजता का अधिकार प्रस्तावना का पार्ट है। निजता का अधिकार संविधान के पार्ट 3 का हिस्सा है लेकिन ये संपूर्ण अधिकार नहीं है। लेकिन यह सामाजिक, नैतिक और पब्लिक हित में केस दर केस निर्भर करेगा। वहीं जस्टिस नरीमन ने कहा कि निजता का अधिकार अनुच्छेद-21 का ही हिस्सा है।

जस्टिस एस. ए. बोबडे

इसमें संदेह नहीं है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार के पार्ट 3 का हिस्सा है और ये अभिन्न अंग है। व्यक्तिगत आजादी और जीवन के अधिकार में निजता शामिल है। ऐसे में मेनका गांधी के केस में दिए गए प्रावधान के तहत उसका परीक्षण होगा। जो भी रोक होगा, वह तर्कपूर्ण, निष्पक्ष और उचित होगा।

जस्टिस एस. के. कौल

निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और यह व्यक्ति के आंतरिक स्थिति को संरक्षित करता है। यह राज्य और प्राइवेट संस्थान के दखल से व्यक्ति को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार देता है। तकनीकी दौर में किसी भी शख्स के घर में बिना दरवाजा खटखटाए कोई भी घुस सकता है। यह उस व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है कि कौन घर में घुसे और कौन नहीं। परिवार, घर, शादी और सेक्शुअल ओरिएंटेशन का संरक्षण जरूरी है जो निजता और गरिमा से जुड़ा हुआ है।

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