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ट्रंप और किम की बैठक शी चिनफिंग पर निर्भर

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पेइचिंग: अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप और किम जोंग-उन अगले महीने परमाणु युद्ध टालने के लिए एक समझौते तक पहुंचने के मकसद से बैठक करने वाले हैं लेकिन इस बैठक की सफलता इन दोनों नेताओं पर नहीं किसी और पर निर्भर करती है। यह कोई और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग हैं।

‘ब्लूमबर्ग’ की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर कोरिया के सबसे बड़े व्यापार सहयोगी देश चीन की तरफ से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों को लागू करने के बाद ही किम अमेरिका से बातचीत के लिए राजी हुए तो वहीं उत्तर कोरिया भी अमेरिका की धमकियों से बचा। अब जब ट्रंप और किम मिलने वाले हैं, तो ऐसे में शी किसी भी ऐसी डील को समर्थन दे सकते हैं जो चीन के लिए अच्छी हो और चीन के हितों के खिलाफ किसी भी डील को प्रभावित भी कर सकते हैं।

उत्तर कोरिया पर ध्यान केंद्रित करने का रास्ता खुला

चीन व्यापार से जुड़े विचार-विमर्श पर पहले ही इस ताकत का फायदा उठाता दिख रहा है। बीते हफ्ते जब उत्तर कोरिया ने वार्ता रद्द करने की धमकी दी तो ट्रंप ने कहा, ‘हो सकता है कि शी अमेरिका के खिलाफ सख्त रुख अपनाने के लिए किम को उकसा रहे हों।’ अमेरिका और चीन ने शनिवार को अपने बीच चल रहे व्यापार युद्ध पर विराम लगाने की घोषणा की, जिससे उत्तर कोरिया पर ध्यान केंद्रित करने का रास्ता खुला।

ट्रंप ने सोमवार को कहा, ‘चीन को उत्तर कोरिया की सीमा पर मजबूती और ताक से पेश आना चाहिए जब तक समझौता न हो जाए।’

युद्ध हुआ तो चीन को सबसे ज्यादा खतरा

चीन संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा है। चीन ने लगातार युद्ध से बचने के लिए लगातार अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच बातचीत की अपील की है। दरअसल, अगर युद्ध होता है या फिर उत्तर कोरियाई सत्ता में परिवर्तन होता है तो इससे चीन की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो सकती है और देश में रेफ्यूजी संकट पैदा हो सकता है। इतना ही नहीं चीन की सीमा के आसपास अमेरिकी सैनिकों की तैनाती भी संभव है।

US-उत्तर कोरिया को करीब नहीं आने देना चाहता चीन

दूसरी तरफ, चीन यह भी नहीं चाहता कि उत्तर कोरिया अमेरिका और दक्षिण कोरिया के करीब जाए क्योंकि ऐसी स्थिति में उसकी अपनी सुरक्षा को खतरा पैदा हो जाएगा। ट्रंप-किम के बीच होने जा रहे ऐतिहासिक सम्मेलन को देखते हुए शी ने खुद को इस वार्ता में शामिल कर लिया है। बैठक से पहले उत्तर कोरियाई नेता शी चिनफिंग हाल के महीनों में दो बार चीन की यात्रा पर गए हैं, तो दूसरी तरफ ट्रंप ने भी फोन पर चिनफिंग से बात की है।

चीन और उसका समर्थन बेहद जरूरी

पेइचिंग के थिंक टैंक पैनगोल इंस्टिट्यूशन के सीनियर फेलो यू ली ने कहा, ‘अगर अमेरिका और दक्षिण कोरिया समझौते की प्रक्रिया में चीन के प्रभाव को कम करने की कोशिश करते भी हैं, तो भी किम की हालिया दो यात्राओं ने यह साबित कर दिया है कि चीन और उसका समर्थन बेहद जरूरी है। भले ही चीन सिंगापुर में होने वाली बैठक में मौजूद न रहे लेकिन वह इस क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने की भूमिका अदा करेगा।’

साल 2015 के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर कोरिया के कुल 3.47 अरब डॉलर के आयात में से 85 प्रतिशत आपूर्ति चीन करता है। इसका मतलब हुआ कि बैठक के दौरान उत्तर कोरिया को डील के हिस्से के तौर पर किसी भी तरह का आर्थिक लालच दिया जाना कठिन है।

उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों में छूट दिलवाने में करेंगे मदद

चीन पहले ही किम को यह आश्वासन दे चुके हैं कि वह उत्तर कोरिया पर लगे प्रतिबंधों में छूट दिलवाने में मदद करेंगे। मार्च में जब किम अपने पहले विदेश दौरे पर चीन गए थे, तब शी ने उनसे कहा था कि चीन ने एक रणनीतिक फैसला लिया है कि उत्तर कोरिया के साथ दोस्ती हमेशा बरकरार रहेगी और यह किसी भी परिस्थिति में बदलेगा नहीं।

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव ऐंतोनियो गुतेरस ने एक इंटरव्यू में कहा, ‘उत्तर कोरिया द्वारा परमाणु हथियारों को छोड़ने के लिए चीन एक गारंटर की भूमिका निभा सकता है। अमेरिका उन्हें नुकसान पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। दूसरी तरफ अमेरिका के लिए भी चीन गारंटर बन सकता है कि अगर किसी तरह का समझौता होता है तो उत्तर कोरिया उस समझौते को लागू करे।’